Wednesday, September 14, 2011

आते एक बार

जाता बन नन्द निकुंज विश्व मेरे लिए
उमा निवास को भी कुटिया लजाती तो
आशा की मुकलित कलि सवेग खिल जाती,
सुरमित वायु सुख सदन बहती तो
होता निहाल एक बार जो निहार पता,
मुक्ति की भी लालसा लाभी ना रह जाती तो
आते एक बार देव भाग्य फिर जाते मेरे,
जीवन की साधना समस्त मिट जाती तो

12 comments:

  1. Sundar shabdo se susajjit aur sualankrit rachna ko post karne ke liye dhanyawad. Kavita me santosh ka
    bhav bade hi manohar dhang se prastut kiya gaya hai jo ki sabse bada dhan hai.
    Lekhan parampara ko jeewit rakhne ke liye apko bhi hardik badhaiyan.

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  2. आज कल मेरी लिखी कविताओ में सभी छंद की कमी को लेकर टोक रहें है..आशा है कुछ सीख सकूँ बाबा की कविताओं से...सांझा करने का शुक्रिया शेफाली.

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  3. एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब...सांझा करने का शुक्रिया शेफाली जी...

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  4. आपके बाबा की कवितायेँ उत्कृष्ट हैं. उनकी कवितायेँ नियमित रूप से शेयर कीजियेगा. आप भाग्यशाली हैं जो ऐसे बाबा मिले हैं.. शुभकामनाएं.

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  5. आप सब का धन्यवाद्
    बस अपनी कोशिश कर रही हूँ

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  6. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com

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  7. जाता बन नन्द निकुंज विश्व मेरे लिए
    उमा निवास को भी कुटिया लजाती तो
    आशा की मुकलित कलि सवेग खिल जाती,
    सुरमित वायु सुख सदन बहती तो
    होता निहाल एक बार जो निहार पता,
    मुक्ति की भी लालसा लाभी ना रह जाती तो
    आते एक बार देव भाग्य फिर जाते मेरे,
    जीवन की साधना समस्त मिट जाती तो

    shephali ji aapki rachna ko padhkar bahut accha laga , aasha karta hu ki aage bhi aap aise hi likhti rahogi

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  8. सैफाली जी,
    आपके बाबा जी की रचनाए बहुत अच्छी लगी,
    कभी कभी इसी तरह पोस्ट करती रहें ..
    मेरे नए पोस्ट में स्वागत है .....

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  9. बहुत सुन्दर...

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